Monday, 1 October 2012

वर्षा-विदाई

आज पिछले दो-तीन दिनों से गर्मी अपने चरम पे थी। समुद्र के किनारे बसा यह मुंबई शहर गर्मी की भीषण चपेट में था।दोपहर की उमस महाविद्यालय के वातानुकूलित कछ से बाहर निकलने पर साफ़ महसूस हो रही थी।लोकल ट्रेन से लेकर महाविद्यालय के उस शीतल कछ तक पूरा दिन गर्मी की गवाही दे  रहा था।
    वर्षा की बूंद धरती पे गिरे लगभग दस-बारह दिन बीत गए थे।सभी को लगा की वर्षा चली गयी है।लेकिन महाविद्यालय छूटने के बाद शाम के पाँच बजे बजे जो खेल आकाश में बादल खेल रहे थे वो वर्षा के आगमन का थोडा संदेश दे रहे थे।बस में भी अज काफी ज्यादा भीड़ थी,जो अमूमन रहती है, जो गर्मी के कारण और भी असह्यानिय लग रही थी।मुझे बैठने के लिए एक सीट मिल गयी थी,लेकिन खिड़की के पास नही।पर उस भीड़ में यही सोच रहा था की "भागते भूत की लंगोटी ही सही।" 
  तब तक आधे घंटे में आकाश का रंग थोडा-थोडा लाल होने लगा था,पर उमस और भी बढ़ गयी थी।रेलवे स्थानक पे भी लोग रुमाल से अपना पसीना पोंछते और ट्रेन पकड़ने की उत्सुकता में दिखा रहे थे।ट्रेन आई,सभी उसमे चढ़ गए।भीड़ नहीं थी,सबसे सुकून की बात यही लग रही थी।मैं  दरवाजे के पास खड़ा हो गया।ठंढी हवा के झोंके का महत्व आज पता चल रहा था।मेरी बगल में खड़ा लड़का अपने दोस्त से अपने घर के हालत के बारे में कुछ बातें कर रहा था,जो हवा के झोंकों के साथ ट्रेन के विपरीत दिशा में चली जा रही थी ,पर हल्की-हल्की  सुनाई  भी  दे रही थी।
   पंद्रह मिनट के बाद मैं अपने गंतव्य पर पहुँच गया।दो मित्र भी स्थानक पर मिले,उनमे से एक अगले गंतव्य पर जाने के लिए ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे।हम चार-पाँच मिनट तक बातें करते रहे।ट्रेन आई और वो मित्र अपने गंतव्य के लिए निकल गए।दुसरे मित्र के साथ सीढियां चढ़ते हुए कुछ  यहाँ-वहा की बातें भी हुई।टिकट परिछक  कुछ लोगों को अपनी अनुभवी निगाहों का शिकार बना रहा था,कुछ उनकी निगाहों से बचते हुए पुल पार कर गए।दस मिनट पुल पर बातें करने के बाद मैं घर की ओर चला गया,पर अलग रास्ते से।
         अब आकाश पूरी तरह से लालिमा से भर गया।ऐसा लगा की अब वर्षा आ ही जाएगी,पर मुंबई की बारिश लुका-छिपी का खेल बहुत अच्छे  से खेलना जानती है।अब तक हवाएं भी नहीं बह रही थी।मुझे तो बस बारिश की फुहारों का इंतज़ार था,जिनका संपर्क अभी तक मुंबई की धरती से नहीं हुआ था।
              घर पहुंचकर माँ और भाभी के मुँह से पहला शब्द सुन,"आज  तो भाई बहुत गर्मी है।"मैं  भी थोडा मुस्कराया।उन्होंने मेरे मन की बात छिन ली।मैंने आते ही हाथ-पैर धोया और भाभी से चाय बने को कहा।जैसे ही समाचारपत्र लेकर बैठा बादल महाराज गरज पड़े।मैं अत्यंत खुश हो गया।अब वर्षा की फुहारें धरती पे पड़ने ही वाली थी।एक भीषण गडगडाहट के साथ मध्यम वर्षा होने लगी।आज मुझे उस कहावत की प्रमाणिकता पे शक होने लगा"जो गरजते है वो बरसते नहीं।" पर मैं तो चाय की चुस्कियों के साथ गरज और बरस दोनों का आनंद ले रहा था और कहावत पर मुस्कुरा  रहा था।
                   माँ कहने लगीं  "अब बरसात जाने वाली है,बादल गरज रहे है न "
 मैं  भी कुछ समय निःशब्द सोचता रहा "अभी दो दिन पहले ही गणपति बाप्पा हमें छोड़कर चले गए, अब बारिश भी हमें छोड़कर जाने की तैयारी में है।"
     पर एक बात तो अवश्य है की ये दोनों आते तो है थोड़े समय के लिए पर पुरे वातावरण को उल्लास और शीतलता से भर देते है।
             मैं भी अब वर्षा को एक टक देख रहा था।अच्छे लोग जल्दी साथ छोड़ जाते है...................