उन रास्तों पर चलना कितना मुश्किल होता है , जिन्हें आपने न चुना हो. पर उन रास्तों पर चलना और भी मुश्किल होता है जिन्हें आपने मजबूरी में चुना हो. क्या होती हैं ये मजबूरियां जो अनचाहे ही किसी मार्ग पर ढकेल देती हैं . गौतम बुद्ध की कही हुई पंक्तियाँ दिमाग में घूमती हैं -" जब अचानक ही अन्धकार आ जाये तो कुछ पल शांत रहो, स्थिर रहो . अँधेरा छटने लगेगा. धैर्य रखो. " अचानक आया अंधकार बहुत ही गहरे उतर जाता है. चाहे वह बाहर का अंधकार हो, या भीतर का. अटलजी की पंक्तियाँ भी दिमाग में कौंधने लगती हैं -
" अँधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा." बहार का अंधकार तो छटने लगता है, धीरे-धीरे, पर भीतर का अन्धकार जमने लगता है, परत दर परत, और भी काला, और भी मोटा, मनो परतों में असंख्य परतें छिपी हैं . अचानक कभी इन्हें देखो, तो कम्पन उठती है , डर लगता है. मन और जीवन को ढंके ये परतें, साफ किये साफ़ नहीं होती. लगता है अब जीवन भी इन्हीं परतों के बीच दम तोड़ देगा .
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